आम आदमी पार्टी ने रिज क्षेत्र में अवैध रूप से काटे गए 1100 पेड़ों के मसाले पर आज फिर भाजपा और एलजी को कटघरे में खड़ा किया। “आप” का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट 1100 पेड़ों की बात कर रहा है और भाजपा 422 पेड़ों की कही और की रिपोर्ट दिखा रही है। अगर भाजपा के पास पेड़ों को काटने की परमिशन थी तो सुप्रीम कोर्ट में जल्द दिखा देती। जो अफसर अपने मंत्री के सामने रिपोर्ट नहीं दे रहे हैं, वो भाजपा को रिपोर्ट दे रहे हैं। इसका मतलब अफसरों की भाजपा से मिलीभगत है। इससे साफ है कि उन्हीं अफसरों के जरिए भाजपा ने गैर कानूनी ढंग से 1100 पेड़ कटवाए। बार-बार सुप्रीम कोर्ट एलजी के विषय में बात कर रहे हैं। एलजी क्यों नहीं सुप्रीम कोर्ट को बताते कि उनके पास परमिशन है।
आम आदमी पार्टी का कहना है कि दिल्ली के छतरपुर इलाके में इको सेंसेटिव जोन, जिसको रिज क्षेत्र भी कहा जाता है और दिल्ली का फेफड़ा भी कहा जाता है। उसमे करीब 1100 पेड़ चोरी छिपे काटे गए। यह पेड़ डीडीए ने काटे हैं। डीडीए केंद्र सरकार के अधीन आता है और इसके चेयरमैन दिल्ली के एलजी विनय सक्सेना हैं। ये मामला जब सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा, तब सुप्रीम कोर्ट को पता चला। इन पेड़ों को काटने की अनुमति सिर्फ सुप्रीम कोर्ट ही दे सकता था। इसके अलावा और कोई अथॉरिटी नहीं दे सकती। इसके बावजूद बिना अनुमति के उन पेड़ों को चोरी छिपे काटा गया और जब चोरी पकड़ी गई, तब इन पेड़ों को काटने की अनुमति लेने के लिए एक एप्लीकेशन यह कह कर लगाई गई कि अभी तक हम पेड़ नहीं काटे हैं और हम इन पेड़ों को काटना चाहते हैं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने पेड़ों को काटने की अनुमति नहीं दी।
पार्टी का कहना है कि इसके करीब 2 महीने बाद एक एनजीओ कोर्ट में पहुंची और सुप्रीम कोर्ट को बताया गया कि जिन पेड़ों की काटने की परमिशन सुप्रीम कोर्ट ने खारिज कर दी, उन पेड़ों को उपराज्यपाल के निर्देश पर डीडीए ने चोरी छिपे काट दिया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट खासा नाराज हुआ। इसमें यह बात साफ है कि कई बार सुप्रीम कोर्ट के अंदर डीडीए के वाइस चेयरमैन को बुलाया जा चुका है। कई बार सुप्रीम कोर्ट में इस बात का जिक्र आ चुका है कि डीडीए की ईमेल यह साफ तौर पर दिखती हैं कि एलजी के निर्देश पर पेड़ काटे गए हैं।
इतने दिनों तक चुप रहने के बाद आज भारतीय जनता पार्टी कुछ कागज लेकर आई है। यह कागज गुमराह करने की कोशिश है। ये काग़ज़ सुप्रीम कोर्ट में क्यों नहीं दिखाए ?अगर डीडीए के पास इन पेड़ों को काटने की अनुमति थी तो उनको पहले ही दिन सुप्रीम कोर्ट में बता देना चाहिए कि उनके पास पेड़ों के काटने की परमिशन है और अब जब 12 जुलाई को दोबारा से सुप्रीम कोर्ट में तारीख है तो डीडीए वहां पर बता दे कि उनके पास इन पेड़ों को काटने की परमिशन है। इसमें इतना परेशान होने की जरूरत ही नहीं है। सच तो यह है कि जिन पेड़ों को डीडीए ने काटा है, वह पेड़ धोखाधड़ी से काटे गए हैं। उन पेड़ों को काटने की अनुमति न तो कोई मंत्री दे सकता है, ना कोई मुख्यमंत्री दे सकता है, ना ही उन पेड़ों को काटने की अनुमति एलजी दे सकते हैं।
उन्होंने कहा कि उन पेड़ों को काटने की अनुमति सिर्फ और सिर्फ सुप्रीम कोर्ट दे सकता है और डीडीए के दस्तावेजों से साफ है कि उसके अधिकारियों को और फॉरेस्ट विभाग के अधिकारियों को हमेशा से यह बात पता थी कि इन पेड़ों को काटने की अनुमति सिर्फ और सिर्फ सुप्रीम कोर्ट से मिल सकती है। डीडीए के पास इन पेड़ों को काटने की अनुमति नहीं थी। इसीलिए चोरी-छिपे पेड़ों को काटा गया। यह बात भी साफ है कि बार-बार अधिकारियों को वन एवं पर्यावरण मंत्री गोपाल राय तलब कर रहे हैं और इस मामले पर रिपोर्ट मांग रहे हैं। मगर अधिकारी उनके सामने नहीं आ रहे हैं और रिपोर्ट नहीं दे रहे हैं। इससे बात साफ है कि चाहे डीडीए के अधिकारी हो, चाहे वन विभाग के अधिकारी हो, चाहे पर्यावरण विभाग के अधिकारी हो, सभी अधिकारियों के ऊपर दबाव है कि इसकी सच्चाई चुनी हुई सरकार को न बताएं और वे यह सच्चाई सुप्रीम कोर्ट पूरा बताएं।